27 June 2020

चप्पल क्रांति


"एक आदर्श गैस के मॉलिक्यूल्स के बीच कोई इंटरेक्शन नहीं होता वह गैस के सभी नियमों का पालन करती है।” हमने यही परिभाषा पढ़ी थी एक आदर्श गैस को लेकर पर उसके बाद यह भी पढ़ा की कोई भी गैस आदर्श नहीं है। ठीक यही बात किसी भी देश की सरकार को लेकर भी लागू होती है। कोई भी सरकार शत प्रतिशत अपने वादों पर खरी उतरे यह असंभव है और इन सब में बाधा बनने वाला सबसे बड़ा फेक्टर है नेताओं की “काम न करने की मंशा” और जनता का विरोध से परहेज करने की आदत। जब तक किसी सरकार का विरोध नहीं होगा तो वह तानाशाही की तरफ ही बढ़ेगी चाहे वो केंद्र की सरकार हो या राज्य की। 

      इस बात का ताजा उदाहरण हम बेलारुस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको के संदर्भ में देख सकते है। जो की पिछले पच्चीस सालों से सता में है पर लोगों को अब उनकी नीतियाँ हजम नहीं हो रही है। लोगों ने राष्ट्रपति की तुलना एक कॉकरेच से कर दी और सड़कों पर निकल गए चप्पल लेकर। हिन्दी मीडिया ने इसे “चप्पल क्रांति” कहा। इस तरह की क्रांति की जरूरत क्यूँ आन पड़ी तो इसके पीछे की वजह है राष्ट्रपति के बेतुकी बयान बाजी। बयान बाजी में तो अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प भी किसी से कम नहीं है। नस्लभेद और कोरोना वायरस को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों की बदोलत अमेरिका भी कुछ दिनों से सांस नहीं ले पा रहा है। यही वजह है की मिशिगन, फ्लोरिडा, एरिजोना जैसी जगहों पर भी वह जो बाइडेन से पिछड़ते दिख रहे है। बयान बाजी के मामले मे ट्रम्प को अपने दोस्त मोदीजी से कुछ सीखना चाहिए किसी भी मुद्दे पर चुप रहने की उनकी कला अद्भुत है। वहीं दूसरी तरफ पात्रा और राहुल गांधी अपने बयानों से जनता के बीच चुटकलों की कमी नहीं होने देते। असल मायनों में देखा जाए तो सता में कॉकरेच हर तरफ है बस बहुत कम जगह ही लोग चप्पल क्रांति कर पाते है। क्योंकि लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए चप्पल क्रांति जरूरी भी है। बहुत जल्द ऐसी ही क्रांति चाइना जैसे देशों में देखी जाएगी। क्योंकि वहाँ की अधिनायकवादी सरकार का भविष्य कुछ ठीक नहीं दिखता। 



28 April 2020

जोजो रेबिट (2019 )


यह मूवी नाजियों के यहूदियों पर किए गए अत्याचार के इर्द गिर्द रचित है। ठीक वैसे ही जैसे “दी बुक थीफ” में बताया गया है। वैसे यह टॉपिक “नाजियों का यहूदियों पर अत्याचार” ऐसा टॉपिक है जिस पर मैं हजारों पन्ने लिख सकता हूँ और यह छोटी बात ही होगी क्योंकि जो मुद्दे विश्व युद्ध करवा सकते है वो छोटे नहीं हो सकते है। अगर भारत में वर्तमान परिदृश्य में देखे तो “दलित अत्याचार” भी कुछ ऐसा ही है मुद्दा है पर डरने की बात नहीं है यह किसी तरह के विश्व युद्द का कारण नहीं बन सकता क्योंकि लोगों ने इसे देख कर आंखे बंद करने की आदत बना ली है। ठीक गांधी जी के उस बंदर की तरह की बुरा मत देखो, ओ सॉरी में मुद्दे से भटक गया। हम मूवी की बात करने वाले थे ना। चलो उसी की बात कर लेते है।

जोजो एक छोटा बच्चा है जिसके दिलों दिमाग पर हिटलर ने घर कर दिया और बचपन से ही जोजो ने खुद को कट्टर नाजी समझ लिया है पर वास्तविकता में वह है नहीं। पर शायद उसके अंदर का हिटलर वास्तविकता वाले हिटलर जितना क्रूर नहीं है। जब जोजो को यह बात पता चलती है की उसकी माँ ने घर में एक यहूदी लड़की को छुपाया है तो जोजो को यह बात जचती नहीं और वह उस लड़की मारने के लिए जाता है। पर सच तो यह है की जोजो जैसे बच्चे को मौत के सही मायने नहीं पता होते है। खेर वो उस लड़की को मार तो नहीं पाता पर वह लड़की उसकी दोस्त जरूर बन जाती है। जिसे वो नाजियों से बचा कर अपने घर में रखता है। पर नाजियों की कट्टर सोच जोजो से उसकी माँ को छिन लेती है। और अंत तक वो लड़की जोजो के अंदर के हिटलर को मारने में समर्थ होती है। खेर देखा जाए तो हम सब जोजो ही है जिसके अंदर एक हिटलर हमेशा रहता है। बस सब को वो लड़की नहीं मिलती जो अंदर के हिटलर को मार सके।

वैसे मेने पढ़ा था की हिटलर ने खुद के सर पर गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी। पर क्या यह सच है की वो इतनी आसानी से मार जाता है। जिस आदमी ने करोड़ों जर्मन लोगों के मन में यहूदियों को लेकर नफरत भरी वो कैसे मर सकता था। क्योंकि नफरत तो कभी मरती नहीं वो अपने रूप बदल लेती है। कभी वो नफरत भीड़ का रूप लेकर किसी निर्दोष को मारती है तो वो हिटलर पुनः जीवित हो जाता है। जब भी तुम अपना कट्टर रूप धारण करते हो तो आप में एक हिटलर पैदा हो जाता है। कट्टर होने का मतलब ही है हिटलर होना। जब तुम कट्टर हो जाओगे तब तुम्हें अपना धर्म खतरे में लगेगा और फिर शुरू होगा निर्दोष हत्याओं का दौर। एक खूबसूरत देश देखते ही देखते आस्विज के यातना शिविरों में बदल जाता है जहाँ निर्दोष इंसानों की चीखो के अलावा कुछ नहीं सुनाई देता है। अतः कट्टरता हमेशा होलोकॉस्ट ही लाती है।

©Vikram N Khorwal

26 December 2019

जिंदगी गुलजार है


एग्जाम देकर सुबह जल्दी वाली ट्रेन से घर को लौट रहा था। एग्जाम देने के बाद मन को जो शांति का एहसास होता है वो सच में सुखद होता है स्पेशली जब एग्जाम अच्छा गया हो।मैंने भी सफर को यादगार बनाने के लिए डेविड बी मूर की किताब “स्टार बिनिथ ऑउर फीट” पढ़ना शुरू कर दिया। कुछ पन्ने पढ़ने के बाद ट्रेन के अंदर के शोर मुझे एकाग्रित होकर किताब नहीं पढ़ने दे रहा था। तब किताब को अपने बेग के ऊपर वाली पॉकेट में डाल कर ईयर फोन निकाल लिए। एक शो काफी समय से देखने की लिए पेंडिंग रखा था सोच वो देख लूँ। मैंने “जिंदगी गुलजार है” देखना शुरू किया। जिसका टाइटल सॉन्ग मुझे बहुत ही पसंद आया और बहुत मोटिवेशनल भी था जो कुछ इस तरह था।
जिंदगी गुलजार है हमको इस से प्यार है
यहा गमों को पालना बेकार है
आना एक बार है, खो देना बेकार है।

असल में यह कहानी है कश्यप और जारून की जहां एक तरफ कश्यप जो अभावों में पली बढ़ी है की जिंदगी तकलीफों से भरी है वहीं दूसरी तरह जारून जो अमीर परिवार में पैदा हुआ है। दोनों के अपनी  जिंदगी को देखने के परीद्रश्य अलग है।कश्यप अक्सर अपनी किस्मत को कोशती है और जारून बिल्कुल उसके विपरीत है। मैंने काफी सफर यह इस शो को देखते हुए ही निकाल लिया था। तभी अचानक से ट्रेन ने ब्रेक दिए और बिना किसी स्टेशन के ट्रेन के रुकने से सब लोग अचरज में थे। कुछ लोग नीचे भी उतरे यह देखने को आखिर ट्रेन आखिर क्यूँ रुकी है। कुछ देर बाद एक आदमी ने बताया की किसी ने ट्रेन के आगे कूदकर आत्म हत्या की है। तब ट्रेन के बहुत से लोग देखने के लिए दौड़े जिसमें मैं भी शामिल था। मैंने वहाँ जाकर जो दृश्य देखा उसने भीतर तक मुझे हिला दिया सच में एक युवक ने आत्म हत्या की थी जिसकी एक टांग पटरी से 10-15 मिटर दूर एक झाड़ी के पास तथा धड़ तथा सिर एक दूसरे से अलग हुए पटरी के दूसरी तरफ पड़े थे। जबकि सारी आँते पटरी पर ही बिखरी पड़ी थी। कुछ पुलिस कर्मी उस बिखरे शरीर को समेटने की कोशिश कर रहे थे जो कभी वापस जुड़ नहीं सकता था। शायद ही कोई व्यक्ति ऐसा वहाँ होगा जिसकी रूह ये सब देख के ना कांपी हो। क्या जिंदगी इतनी सस्ती हो गई है की उसे पटरियों पर यूं बिखेर दिया जाए। क्या गुजरी होगी उस माँ पर जिसने उस शरीर को बनाया और उसे एक बिखरे हुए माँस के कुछ लोथड़े वापस मिले। जिसे वो ढंग से देख भी नहीं सकती है। उस पल सोचा वो लड़का ट्रेन के आगे कूदने से पहले मेरे पास आता और में उसे ये लाइने सुनाता.....
जिंदगी गुलजार है, हमको इस से प्यार है। आना एक बार है, खो देना बेकार है।


©️Vikram N Khorwal

     

5 December 2019

सपने आँखों में चुभते है

सपने आँखों में चुभते है
नींद कहाँ से आएगी 
रात है बहुत बड़ी 
चुनौतियां भी हार जाएगी 

प्रबल हवाएं टहनियों से 
कुछ इस तरह से टकराएगी 
सुखी पतियों की तरह बाधाएं 
राह में बिखर जाएगी 

पथ में तेरी है जो कांटे 
फूल ब्याज जाएंगे 
नई सुबह का आगाज कर 
सुगंध वो फैलाएंगे 

तीर जब आँख को 
अर्जुन की तरह भेद पाएगी 
लक्ष्यों के बीच है जो दूरियाँ 
वो भी मिट जाएगी 


©️Vikram N Khorwal

13 May 2019

प्रलय

अब अख़बार पढ़ते हुए कोई भी बात चौंकाती नहीं ! बलात्कार, अप्रहण, गूसख़ोरी, छेड़छड़, लूटपाट आदि नॉर्मल हो गये है हम लोगों के लिए | जब तक ये वारदातें किसी अपने के साथ ना हों नॉर्मल लगती हैं। सब जगह यही हाल है । हर तरफ एक ही तरह की वारदातें देख कर लगता है मेरा देश एक हो गया है। भुखमरी,बलात्कार और भ्र्ष्टाचारी हमारी राष्ट्रिय एकता के सबसे ताकतवर तत्व बन गए हैं । भाईचारा अपनापन जैसे तत्व कमज़ोर पड़ गए हैं । कैसी अद्भुत एकता है। पंजाब का गेंहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है ।और मध्य प्रदेश का का चावल कोलकाता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है। सब सीमाएं टूट गयी हैं क्योंकि देश एक हैं l बलात्कारियों, मुनाफाखोरों, कालाबाजारियों, भ्र्ष्टाचरियों ने मिलकर राष्ट्र को एक कर दिया है ' ।

हाँ, कुछ बातें ज़रूर चौंकाती है जैसे: “किसी प्रेमी युगल ने मिल कर एक लाख से अधिक पौधे लगा दिए” - बेवक़ूफ़ थे ये लोग जो पौधे लगाने में अपना टाइम ख़राब कर दिया तुम तो स्वर्ग सिधार लोगे थोड़े सालों बाद  फिर क्या आचार डालोगे इन पेड़ों का ज़्यादा से तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को शीतल छाया और शुद्ध हवा मिल जाएगी इस  ज़्यादा क्या होगा ।

“एक सन्यासी गंगा की सफ़ाई के लिए अनशन करता हुआ देवलोक गमन कर लिया” - बाबा भी कम बेवक़ूफ़ नहीं रहे होंगे अरे इतना सारा पानी तो पड़ा है पीने के लिए व्यर्थ में ही अपनी जान गँवा दी वो भी उस नदी को साफ़ करवाने के लिए जो ख़ुद लोगों के पाप हर लेती है ।अनशन करना ही है तो मन्दिर या मस्जिद बनाने के लिए कर लेते क्या पता एम॰पी॰ या एम॰एल॰ए॰ बनने का मौक़ा मिल जाए ।

“टेक्सी वाले ने टेक्सी में रह गये पैसे मालिक को वापस लौटाए” -ये महानुभव तो सबसे ज़्यादा बेवक़ूफ़ निकले पैसे लौटने जैसी कुप्रथा को जन्म दे रहे है। लगता है टेक्सी चलाने से आमदनी कुछ ज़्यादा ही हो गयी है ।

और भ्र्ष्टाचार जैसे मुद्दे तो अब मुद्दे रहे ही नहीं अगर कोई नेता ग़लती से इन पर बात भी कर दे तो अनसुना कर दिया जाता है पीछे से जोर से आवाज आती है ''मंदिर वहीं बनाएँगे''। क्यूँकि हमने तो सर्वांगिन विकास कर लिया है और तो करने को कुछ बचा ही नहीं है और देश में इतनी मखियाँ भी नहीं की हमारे नेता बैठ कर मखियाँ मार सके इसलिए तो वो सिर्फ धर्म और जाति पर ही बोलते है। कभी कोई ये क्यूँ नहीं बोलता "स्कूल वहीं बनाएँगे'' अरे ऐसा तो हरगिज मत बोलना भगवान राम बुरा मान जाएँगे और शिव तीसरा आँख खोल देंगे और धरती पर भीषण प्रलय आ जायेगा । फिर न तुम बचोगे ना हम बचेंगे तो सिर्फ कॉकरोच।


©️Vikram N Khorwal

9 May 2019

सच्चा लेखक

एक लेखक कवि अथवा कहानीकार होना दुनिया के सबसे अद्भुत अनुभवों में से एक है  आप अपनी भावनाएँदुःख-दर्द  अच्छे बुरेअनुभव किसी काग़ज़ पर लिखते है और लोग उन्हें पढ़कर ख़ुद के जीवन की समानताओं को उसमें ढूँढने की कोशिश करते है  किसी ने सही कहा है अच्छा लेखक कभी मरता नहीं है  वह अपनी लिखी कहानियों और किताबों में हज़ारों साल तक जीवित रहता है एक सच्चा लेखक होने की निशानी यह है की आप वही लिखते हो जो आप लिखना चाहते है और जिस दिन वह लिखना शुरू कर दिया जोलोग आप से लिखवाना चाहते हैजो आप के मन की उपज के विपरीत है तो आप के अंदर का लेखक मर जाएगा  लेखक अपनी कल्पनाओंकी दुनिया में रहता हैं जहाँ वह अपने ख़्यालों को उपजाता है और जब ये ख़्याल किसी सुंदर कहानी का रूप लेते है तो पढ़ने वाला निश्चय हीआनंद लेता है।

सच्चा लेखक कभी किसी से बेहतर नहीं लिखना चाहेगा वो सिर्फ़ अपना बेहतर लिखना चाहेगा। 


©️Vikram N Khorwal

विपक्ष का अंत

अभी एक सपना देखा की राहुल गांधी के साथ कई नेताओं ने बी॰जे॰पी॰ जोईंन कर ली थी। तभी वो अचानक से भक्तों के लिए पप्पू से राहुलहो गये थे  वाहटस एप यूनिवर्सिटी में भक्तों की पोस्ट में गांधी परिवार की अच्छी बातों के अलावा कुछ नहीं दिख रहा था कुछ लोग राहुल कीतारीफ़ों के पुल बाँध रहे थे (जो थोड़ा सा funny था )  लोगों की एंटीराहुल आइडियोलोजि जैसे मर चुकी थी  कुछ लोग इस गठबंधन का श्रेयअमित शाह को दे रहे थे  देश में विपक्ष का अंत हो चुका था  मोदी और राहुल साथ में ही बैठे थे  मोदी के भाषण  बाद राहुल का नम्बरआने वाला था  शायद ऐसा दोंनों ने अपनी कुर्सी बचाने के लिए किया होगा क्योंकि “सत्ता सुख परम सुख”  अब सरकार की ग़लत नीतियोंपर बोलने वालों में कुछ लेखकों और गिने चुने पत्रकारों के अलावा कोई नहीं बचा था जिन्हें भी अपनी सुरक्षा का डर सता रहा था  यह एकबहुत ही भयावह सपना था 

सत्ता में विपक्ष का ना होना वास्तव में बहुत ही भयानक होता हैं  इसीलए अपने घर से निकलिए और वोट देने जाइए क्योंकि आपका वोट एक बहुमत की सरकार नहीं तो एक मज़बूत विपक्ष ज़रूर बनाएगा 


©Vikram N Khorwal

2 August 2018

वो बच्चा

गली के मुहाने वाली होटल पर खड़ा वो 7-8 साल का बच्चा शरीर पर एक फटी बनियान ओर एक उधड़ी हुई पेंट के सिवा कुछ भी नहीं था शायद इस विशालकाय बस्ती में नया ही आया था वो होटल के बाहर खड़ा स्कूल बस में चढ़ रहें उन बच्चों की तरफ़ देख रहा था फिर दूसरी तरफ़ घूम के पीपल के नीचे खेल रहे बच्चों की तरफ़ देखता हे ये सब देख वो एक गहरी सोच में डूब जाता हे उसके मन में भी उन बच्चों  साथ खेलने की प्रबल इच्छा थी। मैं उस मासूम से चेहरे पर जो सिकन की रेखाएँ थी वो कूछ समय के लिए उन खेलते बच्चों को देख कर मुस्कुराहट में घुलती देख रहा था

तभी अन्दर से होटल मालिक की भारी भरकम आवाज़ आती है : “कहाँ मर गया रे.....ये बर्तन अभी तक धुलें क्यों नही हे "
ओर इसी बीच वो आँखो में सज़ा रहे सारे सपनों को वहीं पटक के होटल के अंदर भाग जाता हे


मैं चाय की ग्लास को हाथों में लिए इसी बात के बार में सोच रहा था की क्या मजबूरियाँ रही होंगी इस बच्चे की जो उस इतनी कम उम्र में ही इस चाय के होटल तक खिंच लायी थी ज़रूर उसकी माँ बीमार होगी और बाप सारे पैसे शराब में उड़ा देता होगा या फिर बचपन में ही माँ या बाप का साया सर से उठ गया होगा



©️Vikram N Khorwal

25 July 2018

रंगीन चूड़ियाँ




मैं बार बार ऑफ़िस की दीवार पर लगी घड़ी की तरफ़ देख रहा था और ऑफ़िस की छुट्टी होने का इंतज़ार कर रहा था आज बार बार यूँ ऑफ़िस की घड़ी को देखने के पीछे एक विशेष कारण भी था ।तभी मोबाइल फ़ोन की रिंग बजी और मेने फ़ोन उठाया
हैलो
हाँ बेटा बोलिएमैंने कहा 
पापा आप घर कब रहे हो आज मेरा बर्थ डे है आप को याद है ना
मैं आप का बर्थडे कैसे भूल सकता हूँ ओफ़्फ़िस की छुट्टी होते ही में घर रहा हुँ” 
आप जल्दी जाना
कॉल था मेरी पाँच साल की बेटी का जिसका आज बर्थ डे है।
फ़ोन रखते ही मैंने मेरी डेस्क से सामान समेटा और घर जाने के लिए सीटी बस स्टेण्ड की तरफ़ रवाना हो गया
वहाँ कोई सिटी बस आती ना देख मैंने एक टेक्सी रुकवाई और उस में बेठ कर घर की तरफ़ रवाना हो गया  
टेक्सी में बेठने के कुछ समय बाद ही मुख्य काँच की तरफ़ लगी उन रंगीन चूड़ियों ने मेरा ध्यान आकर्षित किया वो चूड़ियाँ बहुत ही प्यारी थी जो की किसी नन्हें हाथों की कलाई के लिए बनाई गयी हो काफ़ी देर तक उन चूड़ियों को देखने के बाद मुझ से रहा नहीं गया और मैंने टेक्सी ड्राइवर से पूछा 
भैया मैं बहुत सी टेक्सियों में बेठा हूँ किसी टेक्सी में मुख्य काँच पर भगवान की तस्वीर तो किसी के टेडी बीयर वगेरह लगे देखता हूँ पर आप ने यें चूड़ियाँ क्यूँ लगा रखी हैं  
टेक्सी ड्राइवर ने एक गहरी सोच में डूबते हुए कहा 
साहब ये चूड़ियाँ कभी मेरी बेटी के नन्हें हाथों में खनका करती थी जिस खनक से मेरा पूरा घर गूँजा करता था  
लेकिन उन दरिंदो ने मेरी पाँच साल की बच्ची को तो नहीं छोड़ा बस उसकी आख़री निशानी ये चूड़ियाँ ही बची हैं जिनको मैंने यहाँ टाँग दिया हैं जब भी इनकी खनक की आवाज़ मेरे कानों में पड़ती हैं तो ऐसा लगता हैं वो मेरे पास में ही हैं ” 

मैं उन आँसुओं को देख रहा था जिनको वो टेक्सी ड्राइवर रोकने की कोशिस कर रहा था ये सब बातें सुन कर मेरे मन में भी मेरी बेटी की चिंता के बादल छाने लगे थे उन चूड़ियों की खनक को में सुनने में असहज महसूस कर रहा था प्रत्येक खनक मुझे उस मासूम के साथ हुई हैवानियत की याद दिला रही थी  



©Vikram N Khorwal