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18 June 2023
27 June 2020
चप्पल क्रांति
"एक आदर्श गैस के मॉलिक्यूल्स के बीच कोई इंटरेक्शन नहीं होता वह गैस के सभी नियमों का पालन करती है।” हमने यही परिभाषा पढ़ी थी एक आदर्श गैस को लेकर पर उसके बाद यह भी पढ़ा की कोई भी गैस आदर्श नहीं है। ठीक यही बात किसी भी देश की सरकार को लेकर भी लागू होती है। कोई भी सरकार शत प्रतिशत अपने वादों पर खरी उतरे यह असंभव है और इन सब में बाधा बनने वाला सबसे बड़ा फेक्टर है नेताओं की “काम न करने की मंशा” और जनता का विरोध से परहेज करने की आदत। जब तक किसी सरकार का विरोध नहीं होगा तो वह तानाशाही की तरफ ही बढ़ेगी चाहे वो केंद्र की सरकार हो या राज्य की।
इस बात का ताजा उदाहरण हम बेलारुस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको के संदर्भ में देख सकते है। जो की पिछले पच्चीस सालों से सता में है पर लोगों को अब उनकी नीतियाँ हजम नहीं हो रही है। लोगों ने राष्ट्रपति की तुलना एक कॉकरेच से कर दी और सड़कों पर निकल गए चप्पल लेकर। हिन्दी मीडिया ने इसे “चप्पल क्रांति” कहा। इस तरह की क्रांति की जरूरत क्यूँ आन पड़ी तो इसके पीछे की वजह है राष्ट्रपति के बेतुकी बयान बाजी। बयान बाजी में तो अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प भी किसी से कम नहीं है। नस्लभेद और कोरोना वायरस को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों की बदोलत अमेरिका भी कुछ दिनों से सांस नहीं ले पा रहा है। यही वजह है की मिशिगन, फ्लोरिडा, एरिजोना जैसी जगहों पर भी वह जो बाइडेन से पिछड़ते दिख रहे है। बयान बाजी के मामले मे ट्रम्प को अपने दोस्त मोदीजी से कुछ सीखना चाहिए किसी भी मुद्दे पर चुप रहने की उनकी कला अद्भुत है। वहीं दूसरी तरफ पात्रा और राहुल गांधी अपने बयानों से जनता के बीच चुटकलों की कमी नहीं होने देते। असल मायनों में देखा जाए तो सता में कॉकरेच हर तरफ है बस बहुत कम जगह ही लोग चप्पल क्रांति कर पाते है। क्योंकि लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए चप्पल क्रांति जरूरी भी है। बहुत जल्द ऐसी ही क्रांति चाइना जैसे देशों में देखी जाएगी। क्योंकि वहाँ की अधिनायकवादी सरकार का भविष्य कुछ ठीक नहीं दिखता।
28 April 2020
जोजो रेबिट (2019 )
यह मूवी नाजियों के यहूदियों पर किए गए अत्याचार के इर्द गिर्द रचित है। ठीक वैसे ही जैसे “दी बुक थीफ” में बताया गया है। वैसे यह टॉपिक “नाजियों का यहूदियों पर अत्याचार” ऐसा टॉपिक है जिस पर मैं हजारों पन्ने लिख सकता हूँ और यह छोटी बात ही होगी क्योंकि जो मुद्दे विश्व युद्ध करवा सकते है वो छोटे नहीं हो सकते है। अगर भारत में वर्तमान परिदृश्य में देखे तो “दलित अत्याचार” भी कुछ ऐसा ही है मुद्दा है पर डरने की बात नहीं है यह किसी तरह के विश्व युद्द का कारण नहीं बन सकता क्योंकि लोगों ने इसे देख कर आंखे बंद करने की आदत बना ली है। ठीक गांधी जी के उस बंदर की तरह की बुरा मत देखो, ओ सॉरी में मुद्दे से भटक गया। हम मूवी की बात करने वाले थे ना। चलो उसी की बात कर लेते है।
जोजो एक छोटा बच्चा है जिसके दिलों दिमाग पर हिटलर ने घर कर दिया और बचपन से ही जोजो ने खुद को कट्टर नाजी समझ लिया है पर वास्तविकता में वह है नहीं। पर शायद उसके अंदर का हिटलर वास्तविकता वाले हिटलर जितना क्रूर नहीं है। जब जोजो को यह बात पता चलती है की उसकी माँ ने घर में एक यहूदी लड़की को छुपाया है तो जोजो को यह बात जचती नहीं और वह उस लड़की मारने के लिए जाता है। पर सच तो यह है की जोजो जैसे बच्चे को मौत के सही मायने नहीं पता होते है। खेर वो उस लड़की को मार तो नहीं पाता पर वह लड़की उसकी दोस्त जरूर बन जाती है। जिसे वो नाजियों से बचा कर अपने घर में रखता है। पर नाजियों की कट्टर सोच जोजो से उसकी माँ को छिन लेती है। और अंत तक वो लड़की जोजो के अंदर के हिटलर को मारने में समर्थ होती है। खेर देखा जाए तो हम सब जोजो ही है जिसके अंदर एक हिटलर हमेशा रहता है। बस सब को वो लड़की नहीं मिलती जो अंदर के हिटलर को मार सके।
वैसे मेने पढ़ा था की हिटलर ने खुद के सर पर गोली मार कर आत्महत्या कर ली थी। पर क्या यह सच है की वो इतनी आसानी से मार जाता है। जिस आदमी ने करोड़ों जर्मन लोगों के मन में यहूदियों को लेकर नफरत भरी वो कैसे मर सकता था। क्योंकि नफरत तो कभी मरती नहीं वो अपने रूप बदल लेती है। कभी वो नफरत भीड़ का रूप लेकर किसी निर्दोष को मारती है तो वो हिटलर पुनः जीवित हो जाता है। जब भी तुम अपना कट्टर रूप धारण करते हो तो आप में एक हिटलर पैदा हो जाता है। कट्टर होने का मतलब ही है हिटलर होना। जब तुम कट्टर हो जाओगे तब तुम्हें अपना धर्म खतरे में लगेगा और फिर शुरू होगा निर्दोष हत्याओं का दौर। एक खूबसूरत देश देखते ही देखते आस्विज के यातना शिविरों में बदल जाता है जहाँ निर्दोष इंसानों की चीखो के अलावा कुछ नहीं सुनाई देता है। अतः कट्टरता हमेशा होलोकॉस्ट ही लाती है।
©Vikram N Khorwal
26 December 2019
जिंदगी गुलजार है
©️Vikram N Khorwal
5 December 2019
सपने आँखों में चुभते है
13 May 2019
प्रलय
हाँ, कुछ बातें ज़रूर चौंकाती है जैसे: “किसी प्रेमी युगल ने मिल कर एक लाख से अधिक पौधे लगा दिए” - बेवक़ूफ़ थे ये लोग जो पौधे लगाने में अपना टाइम ख़राब कर दिया तुम तो स्वर्ग सिधार लोगे थोड़े सालों बाद फिर क्या आचार डालोगे इन पेड़ों का ज़्यादा से तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को शीतल छाया और शुद्ध हवा मिल जाएगी इस ज़्यादा क्या होगा ।
“एक सन्यासी गंगा की सफ़ाई के लिए अनशन करता हुआ देवलोक गमन कर लिया” - बाबा भी कम बेवक़ूफ़ नहीं रहे होंगे अरे इतना सारा पानी तो पड़ा है पीने के लिए व्यर्थ में ही अपनी जान गँवा दी वो भी उस नदी को साफ़ करवाने के लिए जो ख़ुद लोगों के पाप हर लेती है ।अनशन करना ही है तो मन्दिर या मस्जिद बनाने के लिए कर लेते क्या पता एम॰पी॰ या एम॰एल॰ए॰ बनने का मौक़ा मिल जाए ।
“टेक्सी वाले ने टेक्सी में रह गये पैसे मालिक को वापस लौटाए” -ये महानुभव तो सबसे ज़्यादा बेवक़ूफ़ निकले पैसे लौटने जैसी कुप्रथा को जन्म दे रहे है। लगता है टेक्सी चलाने से आमदनी कुछ ज़्यादा ही हो गयी है ।
और भ्र्ष्टाचार जैसे मुद्दे तो अब मुद्दे रहे ही नहीं अगर कोई नेता ग़लती से इन पर बात भी कर दे तो अनसुना कर दिया जाता है पीछे से जोर से आवाज आती है ''मंदिर वहीं बनाएँगे''। क्यूँकि हमने तो सर्वांगिन विकास कर लिया है और तो करने को कुछ बचा ही नहीं है और देश में इतनी मखियाँ भी नहीं की हमारे नेता बैठ कर मखियाँ मार सके इसलिए तो वो सिर्फ धर्म और जाति पर ही बोलते है। कभी कोई ये क्यूँ नहीं बोलता "स्कूल वहीं बनाएँगे'' अरे ऐसा तो हरगिज मत बोलना भगवान राम बुरा मान जाएँगे और शिव तीसरा आँख खोल देंगे और धरती पर भीषण प्रलय आ जायेगा । फिर न तुम बचोगे ना हम बचेंगे तो सिर्फ कॉकरोच।
©️Vikram N Khorwal
9 May 2019
सच्चा लेखक
©️Vikram N Khorwal
विपक्ष का अंत
©Vikram N Khorwal
2 August 2018
वो बच्चा
©️Vikram N Khorwal

