अब अख़बार पढ़ते हुए कोई भी बात चौंकाती नहीं ! बलात्कार, अप्रहण, गूसख़ोरी, छेड़छड़, लूटपाट आदि नॉर्मल हो गये है हम लोगों के लिए | जब तक ये वारदातें किसी अपने के साथ ना हों नॉर्मल लगती हैं। सब जगह यही हाल है । हर तरफ एक ही तरह की वारदातें देख कर लगता है मेरा देश एक हो गया है। भुखमरी,बलात्कार और भ्र्ष्टाचारी हमारी राष्ट्रिय एकता के सबसे ताकतवर तत्व बन गए हैं । भाईचारा अपनापन जैसे तत्व कमज़ोर पड़ गए हैं । कैसी अद्भुत एकता है। पंजाब का गेंहूं गुजरात के कालाबाजार में बिकता है ।और मध्य प्रदेश का का चावल कोलकाता के मुनाफाखोर के गोदाम में भरा है। सब सीमाएं टूट गयी हैं क्योंकि देश एक हैं l बलात्कारियों, मुनाफाखोरों, कालाबाजारियों, भ्र्ष्टाचरियों ने मिलकर राष्ट्र को एक कर दिया है ' ।
हाँ, कुछ बातें ज़रूर चौंकाती है जैसे: “किसी प्रेमी युगल ने मिल कर एक लाख से अधिक पौधे लगा दिए” - बेवक़ूफ़ थे ये लोग जो पौधे लगाने में अपना टाइम ख़राब कर दिया तुम तो स्वर्ग सिधार लोगे थोड़े सालों बाद फिर क्या आचार डालोगे इन पेड़ों का ज़्यादा से तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को शीतल छाया और शुद्ध हवा मिल जाएगी इस ज़्यादा क्या होगा ।
“एक सन्यासी गंगा की सफ़ाई के लिए अनशन करता हुआ देवलोक गमन कर लिया” - बाबा भी कम बेवक़ूफ़ नहीं रहे होंगे अरे इतना सारा पानी तो पड़ा है पीने के लिए व्यर्थ में ही अपनी जान गँवा दी वो भी उस नदी को साफ़ करवाने के लिए जो ख़ुद लोगों के पाप हर लेती है ।अनशन करना ही है तो मन्दिर या मस्जिद बनाने के लिए कर लेते क्या पता एम॰पी॰ या एम॰एल॰ए॰ बनने का मौक़ा मिल जाए ।
“टेक्सी वाले ने टेक्सी में रह गये पैसे मालिक को वापस लौटाए” -ये महानुभव तो सबसे ज़्यादा बेवक़ूफ़ निकले पैसे लौटने जैसी कुप्रथा को जन्म दे रहे है। लगता है टेक्सी चलाने से आमदनी कुछ ज़्यादा ही हो गयी है ।
और भ्र्ष्टाचार जैसे मुद्दे तो अब मुद्दे रहे ही नहीं अगर कोई नेता ग़लती से इन पर बात भी कर दे तो अनसुना कर दिया जाता है पीछे से जोर से आवाज आती है ''मंदिर वहीं बनाएँगे''। क्यूँकि हमने तो सर्वांगिन विकास कर लिया है और तो करने को कुछ बचा ही नहीं है और देश में इतनी मखियाँ भी नहीं की हमारे नेता बैठ कर मखियाँ मार सके इसलिए तो वो सिर्फ धर्म और जाति पर ही बोलते है। कभी कोई ये क्यूँ नहीं बोलता "स्कूल वहीं बनाएँगे'' अरे ऐसा तो हरगिज मत बोलना भगवान राम बुरा मान जाएँगे और शिव तीसरा आँख खोल देंगे और धरती पर भीषण प्रलय आ जायेगा । फिर न तुम बचोगे ना हम बचेंगे तो सिर्फ कॉकरोच।
©️Vikram N Khorwal
हाँ, कुछ बातें ज़रूर चौंकाती है जैसे: “किसी प्रेमी युगल ने मिल कर एक लाख से अधिक पौधे लगा दिए” - बेवक़ूफ़ थे ये लोग जो पौधे लगाने में अपना टाइम ख़राब कर दिया तुम तो स्वर्ग सिधार लोगे थोड़े सालों बाद फिर क्या आचार डालोगे इन पेड़ों का ज़्यादा से तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को शीतल छाया और शुद्ध हवा मिल जाएगी इस ज़्यादा क्या होगा ।
“एक सन्यासी गंगा की सफ़ाई के लिए अनशन करता हुआ देवलोक गमन कर लिया” - बाबा भी कम बेवक़ूफ़ नहीं रहे होंगे अरे इतना सारा पानी तो पड़ा है पीने के लिए व्यर्थ में ही अपनी जान गँवा दी वो भी उस नदी को साफ़ करवाने के लिए जो ख़ुद लोगों के पाप हर लेती है ।अनशन करना ही है तो मन्दिर या मस्जिद बनाने के लिए कर लेते क्या पता एम॰पी॰ या एम॰एल॰ए॰ बनने का मौक़ा मिल जाए ।
“टेक्सी वाले ने टेक्सी में रह गये पैसे मालिक को वापस लौटाए” -ये महानुभव तो सबसे ज़्यादा बेवक़ूफ़ निकले पैसे लौटने जैसी कुप्रथा को जन्म दे रहे है। लगता है टेक्सी चलाने से आमदनी कुछ ज़्यादा ही हो गयी है ।
और भ्र्ष्टाचार जैसे मुद्दे तो अब मुद्दे रहे ही नहीं अगर कोई नेता ग़लती से इन पर बात भी कर दे तो अनसुना कर दिया जाता है पीछे से जोर से आवाज आती है ''मंदिर वहीं बनाएँगे''। क्यूँकि हमने तो सर्वांगिन विकास कर लिया है और तो करने को कुछ बचा ही नहीं है और देश में इतनी मखियाँ भी नहीं की हमारे नेता बैठ कर मखियाँ मार सके इसलिए तो वो सिर्फ धर्म और जाति पर ही बोलते है। कभी कोई ये क्यूँ नहीं बोलता "स्कूल वहीं बनाएँगे'' अरे ऐसा तो हरगिज मत बोलना भगवान राम बुरा मान जाएँगे और शिव तीसरा आँख खोल देंगे और धरती पर भीषण प्रलय आ जायेगा । फिर न तुम बचोगे ना हम बचेंगे तो सिर्फ कॉकरोच।
©️Vikram N Khorwal