गली के मुहाने वाली होटल पर खड़ा वो 7-8 साल का बच्चा शरीर पर एक फटी बनियान ओर एक उधड़ी हुई पेंट के सिवा कुछ भी नहीं था । शायद इस विशालकाय बस्ती में नया ही आया था । वो होटल के बाहर खड़ा स्कूल बस में चढ़ रहें उन बच्चों की तरफ़ देख रहा था फिर दूसरी तरफ़ घूम के पीपल के नीचे खेल रहे बच्चों की तरफ़ देखता हे । ये सब देख वो एक गहरी सोच में डूब जाता हे उसके मन में भी उन बच्चों साथ खेलने की प्रबल इच्छा थी। मैं उस मासूम से चेहरे पर जो सिकन की रेखाएँ थी वो कूछ समय के लिए उन खेलते बच्चों को देख कर मुस्कुराहट में घुलती देख रहा था ।
तभी अन्दर से होटल मालिक की भारी भरकम आवाज़ आती है : “कहाँ मर गया रे.....ये बर्तन अभी तक धुलें क्यों नही हे "
ओर इसी बीच वो आँखो में सज़ा रहे सारे सपनों को वहीं पटक के होटल के अंदर भाग जाता हे ।
मैं चाय की ग्लास को हाथों में लिए इसी बात के बार में सोच रहा था की क्या मजबूरियाँ रही होंगी इस बच्चे की जो उस इतनी कम उम्र में ही इस चाय के होटल तक खिंच लायी थी । ज़रूर उसकी माँ बीमार होगी और बाप सारे पैसे शराब में उड़ा देता होगा । या फिर बचपन में ही माँ या बाप का साया सर से उठ गया होगा ।
©️Vikram N Khorwal
©️Vikram N Khorwal