"एक आदर्श गैस के मॉलिक्यूल्स के बीच कोई इंटरेक्शन नहीं होता वह गैस के सभी नियमों का पालन करती है।” हमने यही परिभाषा पढ़ी थी एक आदर्श गैस को लेकर पर उसके बाद यह भी पढ़ा की कोई भी गैस आदर्श नहीं है। ठीक यही बात किसी भी देश की सरकार को लेकर भी लागू होती है। कोई भी सरकार शत प्रतिशत अपने वादों पर खरी उतरे यह असंभव है और इन सब में बाधा बनने वाला सबसे बड़ा फेक्टर है नेताओं की “काम न करने की मंशा” और जनता का विरोध से परहेज करने की आदत। जब तक किसी सरकार का विरोध नहीं होगा तो वह तानाशाही की तरफ ही बढ़ेगी चाहे वो केंद्र की सरकार हो या राज्य की।
इस बात का ताजा उदाहरण हम बेलारुस के राष्ट्रपति अलेक्जेंडर लुकाशेंको के संदर्भ में देख सकते है। जो की पिछले पच्चीस सालों से सता में है पर लोगों को अब उनकी नीतियाँ हजम नहीं हो रही है। लोगों ने राष्ट्रपति की तुलना एक कॉकरेच से कर दी और सड़कों पर निकल गए चप्पल लेकर। हिन्दी मीडिया ने इसे “चप्पल क्रांति” कहा। इस तरह की क्रांति की जरूरत क्यूँ आन पड़ी तो इसके पीछे की वजह है राष्ट्रपति के बेतुकी बयान बाजी। बयान बाजी में तो अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प भी किसी से कम नहीं है। नस्लभेद और कोरोना वायरस को लेकर की गई उनकी टिप्पणियों की बदोलत अमेरिका भी कुछ दिनों से सांस नहीं ले पा रहा है। यही वजह है की मिशिगन, फ्लोरिडा, एरिजोना जैसी जगहों पर भी वह जो बाइडेन से पिछड़ते दिख रहे है। बयान बाजी के मामले मे ट्रम्प को अपने दोस्त मोदीजी से कुछ सीखना चाहिए किसी भी मुद्दे पर चुप रहने की उनकी कला अद्भुत है। वहीं दूसरी तरफ पात्रा और राहुल गांधी अपने बयानों से जनता के बीच चुटकलों की कमी नहीं होने देते। असल मायनों में देखा जाए तो सता में कॉकरेच हर तरफ है बस बहुत कम जगह ही लोग चप्पल क्रांति कर पाते है। क्योंकि लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए चप्पल क्रांति जरूरी भी है। बहुत जल्द ऐसी ही क्रांति चाइना जैसे देशों में देखी जाएगी। क्योंकि वहाँ की अधिनायकवादी सरकार का भविष्य कुछ ठीक नहीं दिखता।

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